जब हमारे नन्हे-मुन्ने को ज़रा सी भी सर्दी-खांसी हो जाती है, तो माँ-बाप का दिल बैठ जाता है. घर में बच्चे की हल्की सी आवाज़ बदल जाए या नाक बहने लगे, तो हम तुरंत परेशान हो जाते हैं और सोचने लगते हैं कि क्या अब डॉक्टर के पास जाना चाहिए या कुछ घरेलू नुस्खे ही काफी हैं?
मैंने खुद कई बार इस दुविधा का सामना किया है और जाना है कि सही समय पर सही फैसला लेना कितना ज़रूरी होता है. आजकल के बदलते मौसम में बच्चों की इम्यूनिटी को समझना और उन्हें बीमारियों से बचाना एक बड़ी चुनौती है.
कई बार हमें लगता है कि मामूली सर्दी है, लेकिन कभी-कभी ये किसी गंभीर चीज़ का संकेत भी हो सकती है. घबराने की ज़रूरत नहीं है, बस थोड़ी सी जानकारी और सतर्कता हमें बड़े मुश्किलों से बचा सकती है.
इस पोस्ट में, हम बच्चों की सर्दी के इलाज के लिए अस्पताल कब जाना चाहिए और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे. आइए, इस उलझन को सुलझाते हैं और जानते हैं सारी बातें विस्तार से!
जब सर्दी लगे मामूली, पर दिल कहे ‘सावधान!’

छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना क्यों है ज़रूरी?
अक्सर हम बच्चे की ज़रा सी नाक बहने या हल्की खांसी को मामूली समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं, सोचते हैं कि “अरे, मौसम बदल रहा है, हो जाएगा ठीक!” लेकिन मेरा अपना अनुभव कहता है कि कभी-कभी ये छोटी-छोटी बातें ही बड़े संकेत दे जाती हैं.
जब मेरा छोटा बेटा एक बार ऐसे ही हल्के जुकाम से परेशान था, तो मैंने भी सोचा कि घर पर ही ठीक हो जाएगा. लेकिन तीन दिन बाद उसकी खांसी इतनी बढ़ गई कि रात भर सो नहीं पाया.
तब मुझे लगा कि मेरी लापरवाही भारी पड़ सकती थी. बच्चों का शरीर नाजुक होता है और उनकी इम्यूनिटी अभी पूरी तरह से विकसित नहीं हुई होती, इसलिए एक हल्की सी सर्दी भी अगर ठीक से संभाली न जाए तो आगे चलकर छाती में कफ जमने या इन्फेक्शन का रूप ले सकती है.
हमें पेरेंट्स के तौर पर अपने बच्चों की सेहत के प्रति हमेशा सतर्क रहना चाहिए, क्योंकि वे खुद अपनी तकलीफ ठीक से बता नहीं पाते. कभी-कभी सिर्फ एक छोटी सी छींक भी भीतर पनप रही किसी बड़ी समस्या की निशानी हो सकती है.
इसलिए, हर छोटे लक्षण को ध्यान से देखना और समझना बेहद ज़रूरी है.
कब तक करें घरेलू नुस्खों पर भरोसा?
भारतीय घरों में दादी-नानी के नुस्खे सदियों से चले आ रहे हैं और वाकई कई बार ये कमाल का काम करते हैं! तुलसी का काढ़ा, अदरक का रस, शहद, हल्दी वाला दूध – ये सब मेरी रसोई का अहम हिस्सा रहे हैं जब भी मेरे बच्चे को सर्दी-खांसी हुई है.
मैंने खुद कई बार देखा है कि हल्के जुकाम में ये नुस्खे बहुत राहत देते हैं और बच्चे को बिना दवाओं के ठीक होने में मदद मिलती है. लेकिन, इन नुस्खों की भी एक सीमा होती है.
मेरा मानना है कि अगर दो-तीन दिन के भीतर बच्चे की हालत में सुधार नहीं हो रहा है, या फिर लक्षण और बिगड़ते जा रहे हैं, तो हमें तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
कई बार हम “एक और दिन देख लेते हैं” के चक्कर में महत्वपूर्ण समय गंवा देते हैं, जो बच्चे की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता. घरेलू नुस्खे सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे हमेशा डॉक्टर की सलाह का विकल्प नहीं बन सकते.
ये ‘रेड अलर्ट’ संकेत, जिनसे जान सकते हैं कि अब अस्पताल जाना ही होगा!
बुखार, साँस लेने में दिक्कत: इन्हें हल्के में न लें!
सच कहूँ तो, एक माँ के तौर पर मेरे लिए सबसे डरावना पल वो होता है जब बच्चे को तेज़ बुखार चढ़ जाए और वो बेजान सा लगने लगे. जब बच्चे का तापमान 102°F (39°C) से ऊपर चला जाए, खासकर अगर वो 3 महीने से छोटा हो, तो इंतज़ार करने का कोई मतलब नहीं.
तुरंत डॉक्टर के पास भागना ही समझदारी है. मेरा अपना अनुभव है कि जब मेरे बेटे को एक बार बहुत तेज़ बुखार हुआ था और वो लगातार रोए जा रहा था, मैंने बिना एक पल गंवाए उसे अस्पताल पहुंचाया.
बाद में पता चला कि यह एक वायरल इन्फेक्शन था जिसे सही समय पर काबू कर लिया गया. सिर्फ बुखार ही नहीं, साँस लेने में तकलीफ होना भी एक बहुत बड़ा ‘रेड अलर्ट’ सिग्नल है.
अगर आपका बच्चा सामान्य से तेज़ साँस ले रहा है, साँस लेते समय उसकी पसलियाँ अंदर धंस रही हैं, या वो साँस लेने में आवाज़ कर रहा है, तो समझ जाइए कि यह गंभीर स्थिति है.
बच्चों को निमोनिया या ब्रोंकियोलाइटिस जैसी बीमारियां आसानी से हो जाती हैं, और उनमें साँस की समस्या जानलेवा हो सकती है.
खाने-पीने में दिक्कत और सुस्ती: ये भी हैं बड़े खतरे!
जब बच्चा बीमार होता है तो थोड़ा चिड़चिड़ा और कम खाने वाला हो जाता है, ये बात तो हम सब जानते हैं. लेकिन अगर आपका बच्चा बिल्कुल भी खाना या पीना नहीं चाह रहा है, या फिर वो इतना सुस्त हो गया है कि खेलने या प्रतिक्रिया देने में भी दिलचस्पी नहीं ले रहा, तो यह चिंता का विषय है.
निर्जलीकरण (Dehydration) बच्चों के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है, खासकर जब उन्हें बुखार भी हो. मैंने एक बार देखा था कि मेरी भतीजी को बुखार के साथ-साथ उल्टी और दस्त भी हो रहे थे, और वह इतनी सुस्त हो गई थी कि बस लेटी रहती थी.
उसकी माँ ने तुरंत उसे डॉक्टर को दिखाया, और पता चला कि उसे गंभीर निर्जलीकरण हो गया था. इसके अलावा, अगर बच्चे को लगातार उल्टी या दस्त हो रहे हों, होंठ सूखे दिखें, या वो पेशाब कम करे, तो ये भी तुरंत डॉक्टरी मदद के संकेत हैं.
कभी-कभी इन लक्षणों को हम सामान्य मान लेते हैं, पर ये शरीर में पानी की कमी या किसी अंदरूनी इन्फेक्शन की निशानी हो सकते हैं.
कब और कैसे चुनें सही डॉक्टर और अस्पताल?
सही बाल रोग विशेषज्ञ का चुनाव क्यों है ज़रूरी?
एक अच्छा बाल रोग विशेषज्ञ (pediatrician) मिलना किसी वरदान से कम नहीं होता. मैंने खुद इस बात को कई बार महसूस किया है कि जब आपको अपने डॉक्टर पर पूरा भरोसा होता है, तो आधी चिंता तो वहीं खत्म हो जाती है.
एक ऐसा डॉक्टर चुनें जिसका बच्चों के साथ व्यवहार अच्छा हो, जो आपकी बातों को ध्यान से सुने और जिसके पास इमरजेंसी में संपर्क करने का कोई तरीका हो. मेरे घर के पास एक बाल रोग विशेषज्ञ हैं, जो हमेशा बच्चों को खेलते-खेलते ही चेक करते हैं, जिससे बच्चे डरते नहीं.
वे मुझे हमेशा छोटे-छोटे टिप्स भी देते हैं जो मुझे बच्चे की देखभाल में बहुत मदद करते हैं. मैं हमेशा सलाह दूंगी कि आप अपने आस-पास के कुछ अच्छे बाल रोग विशेषज्ञों के बारे में जानकारी रखें और इमरजेंसी के लिए उनके संपर्क नंबर अपने पास रखें.
किसी भी गंभीर स्थिति में सही डॉक्टर का चुनाव आपको सही दिशा और मानसिक शांति दे सकता है.
अस्पताल जाने से पहले की ज़रूरी तैयारियाँ.
अचानक अस्पताल भागना पड़े तो बहुत घबराहट होती है, इसलिए मैं हमेशा कुछ बातों का ध्यान रखती हूँ. सबसे पहले, बच्चे के पिछले मेडिकल रिकॉर्ड्स, अगर कोई दवा चल रही हो, या अगर उसे किसी चीज़ से एलर्जी हो, तो उन सबकी जानकारी एक जगह लिखकर रखें.
मैंने खुद एक छोटी डायरी बना रखी है जिसमें ये सब जानकारी रहती है. दूसरा, बच्चे के लिए कम्फर्टेबल कपड़े, उसका पसंदीदा खिलौना या कोई कंबल साथ रखना न भूलें.
इससे बच्चा अस्पताल के माहौल में भी थोड़ा सहज महसूस करता है. मेरे बेटे को उसकी छोटी सी टेडी बियर बहुत पसंद है, और मैं हमेशा उसे साथ रखती हूँ जब भी हमें कहीं बाहर जाना होता है.
अस्पताल में इंतज़ार करना पड़ सकता है, तो बच्चे को व्यस्त रखने के लिए कोई किताब या छोटा सा खिलौना ले जाना भी अच्छा रहता है. और हाँ, अपने लिए भी पानी की बोतल और कोई हल्का स्नैक साथ रख लें, क्योंकि ये stressful समय होता है.
इम्यूनिटी बूस्टर्स: छोटे-छोटे कदम, बड़ा असर
खान-पान में बदलाव और विटामिन का महत्व
मैंने बचपन से ही देखा है कि जिन बच्चों की डाइट अच्छी होती है, वे कम बीमार पड़ते हैं. और मेरा अनुभव भी यही कहता है कि बच्चों की इम्यूनिटी को मजबूत रखने में पौष्टिक आहार का बहुत बड़ा हाथ होता है.
हरी सब्ज़ियाँ, ताज़े फल, दालें, दही और दूध – ये सब बच्चों की डाइट का अहम हिस्सा होने चाहिए. मेरे बच्चे को बचपन में ब्रोकली बिल्कुल पसंद नहीं थी, लेकिन मैंने उसे अलग-अलग तरीकों से खिलाना शुरू किया – कभी सूप में, कभी हल्के फ्राई करके, और धीरे-धीरे उसे इसका स्वाद पसंद आने लगा.
विटामिन सी (Vitamin C) से भरपूर फल जैसे संतरा, कीवी, और अमरूद इम्यूनिटी के लिए बहुत अच्छे होते हैं. मैंने अपने बच्चों को सर्दियों में रोज़ एक संतरा खिलाना अपनी आदत बना लिया है.
सिर्फ खाने-पीने पर ही नहीं, बल्कि बच्चों को धूप में कुछ देर खेलने देना भी ज़रूरी है, क्योंकि धूप से उन्हें विटामिन डी (Vitamin D) मिलता है, जो हड्डियों और इम्यूनिटी दोनों के लिए अच्छा होता है.
साफ-सफाई और सही आदतें: बीमारी से बचाओ का पहला पाठ

ये तो हम सभी जानते हैं कि साफ-सफाई बीमारी को दूर रखने का सबसे पहला और सबसे आसान तरीका है. बच्चों को शुरू से ही हाथ धोने की आदत डालना बहुत ज़रूरी है, खासकर खाना खाने से पहले और खेलने के बाद.
मुझे याद है कि जब मेरा बेटा छोटा था, तो उसे साबुन से हाथ धोना बिल्कुल पसंद नहीं था, लेकिन मैंने उसे एक ऐसा साबुन लाकर दिया जिस पर उसका पसंदीदा कार्टून कैरेक्टर बना था, और फिर उसे हाथ धोना पसंद आने लगा.
इसके अलावा, घर को साफ-सुथरा रखना, खिलौनों को नियमित रूप से साफ करना और बच्चों को भीड़-भाड़ वाली जगहों पर ले जाने से बचना भी बहुत मदद करता है. खांसी या छींक आने पर मुंह को ढंकने की आदत डालना भी संक्रमण को फैलने से रोकता है.
ये छोटी-छोटी आदतें बच्चे को कई तरह के इन्फेक्शन से बचाती हैं और उनकी ओवरऑल सेहत को सुधारती हैं.
सर्दी-खांसी में बच्चे को क्या खिलाएं और क्या न खिलाएं?
आरामदायक और पौष्टिक आहार
जब बच्चा बीमार होता है, तो उसका कुछ भी खाने का मन नहीं करता और यह देखकर मेरा दिल घबरा जाता है. लेकिन इस समय उसे पोषण देना बहुत ज़रूरी है ताकि उसका शरीर बीमारी से लड़ सके.
मैंने हमेशा कोशिश की है कि जब मेरे बच्चे को सर्दी-खांसी हो, तो उसे हल्की, सुपाच्य और पौष्टिक चीजें दूं. खिचड़ी, दलिया, सूप (सब्जियों का या चिकन का), मूंग दाल का पानी, और ताज़ी फलों का जूस जैसे संतरे का जूस, अनार का जूस ये सब बहुत फायदेमंद होते हैं.
खासकर, सूप और दाल का पानी शरीर को हाइड्रेटेड रखते हैं और गले को आराम देते हैं. मुझे याद है कि जब मेरा बेटा छोटा था और उसे खांसी होती थी, तो उसे गर्म चिकन सूप पिलाने से बहुत राहत मिलती थी.
ठंडी चीजें जैसे आइसक्रीम या फ्रिज का पानी इस दौरान बिल्कुल नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे गले में तकलीफ बढ़ सकती है.
क्या अवॉइड करें और क्यों?
सर्दी-खांसी के दौरान कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें हमें बिल्कुल अवॉइड करना चाहिए. सबसे पहले तो ठंडी चीजें, जैसे ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक्स, आइसक्रीम, और फ्रिज में रखा दही.
ये गले में खराश और कफ को बढ़ा सकते हैं. मैंने खुद देखा है कि जब बच्चे को सर्दी हो और अगर गलती से भी उसे ठंडी चीज़ मिल जाए, तो उसकी हालत और बिगड़ जाती है.
इसके अलावा, बहुत ज़्यादा तैलीय और मसालेदार खाना भी इस समय अच्छा नहीं होता, क्योंकि इसे पचाना मुश्किल होता है और यह पेट को भी खराब कर सकता है. जंक फूड जैसे चिप्स, पिज़्ज़ा, और बर्गर में कोई पोषक तत्व नहीं होते और ये बच्चे की इम्यूनिटी को भी कमजोर कर सकते हैं.
चीनी वाली चीज़ें भी कम देनी चाहिए क्योंकि ज़्यादा चीनी शरीर में सूजन को बढ़ा सकती है. सादा, घर का बना खाना ही सबसे अच्छा होता है.
| लक्षण | कब डॉक्टर के पास जाना चाहिए? | कब घर पर उपचार कर सकते हैं? |
|---|---|---|
| तेज़ बुखार (102°F/39°C से ऊपर) | तुरंत (विशेषकर 3 महीने से छोटे बच्चे) | अगर हल्का बुखार हो और बच्चा सक्रिय हो |
| साँस लेने में कठिनाई या तेज़ साँस लेना | तुरंत | हल्की खांसी, बिना साँस की तकलीफ के |
| लगातार उल्टी या दस्त | अगर बच्चा सुस्त हो, पेशाब कम करे | एक-दो बार उल्टी या दस्त, बच्चा सक्रिय हो |
| गंभीर सुस्ती या चिड़चिड़ापन | अगर बच्चा प्रतिक्रिया न दे या बहुत कम खेले | थोड़ी थकान या बेचैनी |
| खाना-पीना बिल्कुल छोड़ देना | अगर निर्जलीकरण के लक्षण दिखें | भूख थोड़ी कम हो, लेकिन तरल पदार्थ ले रहा हो |
| होठों या नाखून के नीचे नीलापन | तुरंत (ऑक्सीजन की कमी का संकेत) | कोई नहीं, यह हमेशा गंभीर होता है |
बच्चों की सर्दी से जुड़ी कुछ आम गलतफहमियां और उनकी सच्चाई
क्या एंटीबायोटिक्स हमेशा समाधान हैं?
मैंने देखा है कि कई पेरेंट्स को लगता है कि बच्चे को सर्दी-खांसी हुई है, तो एंटीबायोटिक्स ही इसका इलाज है. लेकिन यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है. सच्चाई यह है कि ज़्यादातर बच्चों की सर्दी-खांसी वायरल इन्फेक्शन (viral infection) की वजह से होती है, और एंटीबायोटिक्स सिर्फ बैक्टीरियल इन्फेक्शन (bacterial infection) पर ही असर करते हैं.
मेरे डॉक्टर ने मुझे कई बार समझाया है कि अनावश्यक रूप से एंटीबायोटिक्स देने से बच्चे के शरीर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस (antibiotic resistance) पैदा हो सकता है, जिसका मतलब है कि जब वाकई बैक्टीरियल इन्फेक्शन होगा, तो दवाएं असर नहीं करेंगी.
मैंने खुद इस बात का ध्यान रखा है कि जब तक डॉक्टर न कहें, मैं अपने बच्चों को एंटीबायोटिक्स न दूं. अगर डॉक्टर एंटीबायोटिक्स दे भी रहे हैं, तो कोर्स पूरा करना बहुत ज़रूरी है, भले ही बच्चा बेहतर महसूस करने लगे.
यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात है जो हर पेरेंट को समझनी चाहिए.
ठंड लगना और सर्दी लगना: क्या ये एक ही बात है?
अक्सर हम कहते हैं, “मेरे बच्चे को ठंड लग गई, इसलिए उसे सर्दी हो गई.” लेकिन वैज्ञानिक रूप से ‘ठंड लगना’ और ‘सर्दी लगना’ दो अलग-अलग बातें हैं. सर्दी एक वायरल इन्फेक्शन है, जो राइनोवायरस (rhinovirus) जैसे वायरसों के कारण होता है.
ठंडे मौसम में वायरस तेज़ी से फैलते हैं और हमारी इम्यूनिटी थोड़ी कमजोर हो सकती है, जिससे हमें इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है. लेकिन सिर्फ ठंड लगने से सर्दी नहीं होती.
मैंने अपने बच्चों को सर्दियों में भी खूब खेलने दिया है, बस इस बात का ध्यान रखा है कि उन्हें गर्म कपड़े पहनाए जाएं और खेलने के बाद गीले कपड़े तुरंत बदल दिए जाएं.
अगर आपका बच्चा ठंडी हवा में गया और उसे सर्दी हो गई, तो इसका मतलब यह नहीं कि उसे ठंड लगने से सर्दी हुई है, बल्कि हो सकता है कि वह पहले से ही किसी वायरस के संपर्क में आ गया हो.
इसलिए, बच्चे को सिर्फ ठंड से बचाने के बजाय, उसकी इम्यूनिटी मजबूत करने और साफ-सफाई पर ध्यान देने की ज़्यादा ज़रूरत है.
चलते-चलते
तो दोस्तों, बात बस इतनी सी है कि अपने बच्चों की सेहत के प्रति हम जितना सतर्क रहेंगे, उतनी ही आसानी से उन्हें हर मुश्किल से बचा पाएंगे. एक माँ के तौर पर, मैंने सीखा है कि हमारे छोटे-छोटे बच्चे हमें अनकहे संकेत देते हैं, जिन्हें समझना हमारा पहला कर्तव्य है. कभी-कभी हम सोचते हैं कि घर पर सब ठीक हो जाएगा, लेकिन जब बात बच्चों की सेहत की हो, तो थोड़ी सी भी लापरवाही भारी पड़ सकती है. इसलिए, अपने instincts पर भरोसा करें, लेकिन ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह लेने में बिल्कुल भी देर न करें. उनकी मुस्कुराहट और सेहत से बढ़कर कुछ नहीं, है ना?
कुछ ज़रूरी बातें जो हमेशा याद रखें
1. बच्चे को ज़रा भी असामान्य लक्षण दिखें, तो तुरंत ध्यान दें; मामूली लगने वाली चीज़ें भी कभी-कभी बड़े संकेत हो सकती हैं. घर पर उपचार की एक सीमा होती है.
2. अगर बुखार 102°F (39°C) से ऊपर जाए, साँस लेने में दिक्कत हो, या बच्चा बहुत सुस्त हो, तो बिना देर किए डॉक्टर के पास जाएँ. ये ‘रेड अलर्ट’ संकेत हैं.
3. अपने आस-पास एक भरोसेमंद बाल रोग विशेषज्ञ का पता रखें और इमरजेंसी संपर्क नंबर हमेशा अपने पास रखें. सही डॉक्टर सही समय पर बहुत मदद कर सकता है.
4. बच्चों की इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए पौष्टिक आहार, विटामिन (जैसे विटामिन सी और डी) और साफ़-सफ़ाई का खास ख्याल रखें. ये बीमार पड़ने से बचाते हैं.
5. सर्दी-खांसी में ठंडी, तैलीय और ज़्यादा मसालेदार चीज़ों से परहेज़ करें. हल्की, सुपाच्य और गर्म चीज़ें जैसे सूप और खिचड़ी दें, जो उन्हें ठीक होने में मदद करें.
मुख्य बातें एक नज़र में
बच्चों की सेहत के मामलों में सतर्कता और सही जानकारी बहुत अहम है. छोटी सी सर्दी भी गंभीर रूप ले सकती है अगर उस पर ध्यान न दिया जाए. घरेलू नुस्खे अच्छे हैं, पर उनकी सीमाएं समझें. तेज़ बुखार, साँस लेने में दिक्कत, अत्यधिक सुस्ती या खाना-पीना छोड़ देना जैसे लक्षण होने पर बिना देरी किए बाल रोग विशेषज्ञ से मिलें. सही डॉक्टर का चुनाव और इमरजेंसी के लिए तैयारी रखना ज़रूरी है. अंत में, बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने के लिए संतुलित आहार, विटामिन, अच्छी साफ़-सफ़ाई और सही आदतों को अपनाना सबसे प्रभावी तरीका है. एंटीबायोटिक्स का अनावश्यक उपयोग न करें, क्योंकि यह केवल वायरल इन्फेक्शन के लिए नहीं होते हैं.
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) 📖
प्र: मेरे बच्चे को सर्दी-खांसी है, मुझे उसे अस्पताल कब ले जाना चाहिए?
उ: मेरा अपना अनुभव रहा है कि जब बच्चे को सर्दी-खांसी होती है तो माँ-बाप सबसे पहले यही सोचते हैं कि डॉक्टर के पास जाएँ या नहीं। देखिए, हल्की-फुल्की सर्दी में आप कुछ घरेलू नुस्खे आजमा सकते हैं, लेकिन कुछ ऐसे संकेत होते हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करना बिल्कुल भी ठीक नहीं। अगर आपके बच्चे को साँस लेने में दिक्कत हो रही है, जैसे कि तेज़-तेज़ साँस लेना, छाती का धँसना, या साँस लेते समय अजीब सी आवाज़ आना, तो बिना एक पल भी गँवाए तुरंत अस्पताल ले जाएँ। मैंने खुद देखा है कि कई बार बच्चे को तेज़ बुखार (102°F से ऊपर) आता है जो दवा से भी नीचे नहीं उतरता, तो यह भी खतरे की घंटी है। अगर बच्चा बहुत ज़्यादा सुस्त है, कुछ खा-पी नहीं रहा, या लगातार उल्टियाँ कर रहा है, तो समझ लीजिए कि अब देर करने का समय नहीं है। छोटे बच्चों, खासकर नवजात शिशुओं में, अगर मामूली सर्दी भी लगातार बनी रहती है और उनके व्यवहार में कोई बदलाव आता है, तो डॉक्टर से मिलना ज़रूरी हो जाता है। हमेशा अपनी अंतरात्मा की सुनो और अगर आपको ज़रा भी लगे कि कुछ ठीक नहीं है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लो। यह बच्चों की सेहत का मामला है, कोई रिस्क क्यों लेना!
प्र: बच्चे को सामान्य सर्दी होने पर घर पर क्या देखभाल करनी चाहिए और किन गलतियों से बचना चाहिए?
उ: जब हमारे बच्चे को सर्दी होती है, तो हम माँ-बाप के रूप में सबसे पहले उसे आराम देने की कोशिश करते हैं। मैंने खुद अपने बच्चों के लिए कई घरेलू उपचार अपनाए हैं और उनका असर भी देखा है। सबसे पहले, बच्चे को खूब तरल पदार्थ दें, जैसे पानी, नारियल पानी, जूस या सूप। इससे शरीर में पानी की कमी नहीं होगी और बलगम भी पतला होकर आसानी से निकल जाएगा। बच्चे को पर्याप्त आराम करने दें, क्योंकि नींद ही सबसे बड़ी दवा है। अगर बच्चा छोटा है, तो उसके कमरे में ह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल करना भी बहुत फ़ायदेमंद होता है, इससे हवा में नमी बनी रहती है और बंद नाक खुलने में मदद मिलती है। मैंने अक्सर देखा है कि लोग तुरंत एंटीबायोटिक्स देना शुरू कर देते हैं, जबकि सर्दी अक्सर वायरल इन्फेक्शन के कारण होती है और उसमें एंटीबायोटिक्स का कोई काम नहीं होता। डॉक्टर की सलाह के बिना कभी भी कोई भी दवा, खासकर बच्चों के लिए, न दें। मेरी एक दोस्त ने एक बार अपने बच्चे को ज़रूरत से ज़्यादा कफ सिरप दे दिया था, जिससे उसे घबराहट होने लगी थी। इसलिए, ओवर-द-काउंटर दवाओं से भी बचें। सबसे ज़रूरी बात, अपने बच्चे को लगातार मॉनिटर करते रहें। अगर आपको लगे कि हालत बिगड़ रही है, तो घर पर इंतज़ार न करें और डॉक्टर से मिलें।
प्र: क्या बच्चों में सर्दी-खांसी को हमेशा गंभीर रूप से लेना चाहिए या यह अपने आप ठीक हो सकती है?
उ: यह एक ऐसा सवाल है जो हर माँ-बाप के मन में आता है, और मैं भी इससे गुज़री हूँ। मेरा मानना है कि बच्चों में सर्दी-खांसी को कभी भी पूरी तरह से नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि हर छींक पर अस्पताल भागो!
अक्सर, सामान्य सर्दी कुछ दिनों में अपने आप ठीक हो जाती है, खासकर अगर बच्चा ठीक से खा-पी रहा हो और उसकी सामान्य गतिविधि में कोई कमी न आई हो। मैंने देखा है कि मेरे बच्चे को जब हल्की सर्दी होती है, तो मैं उसे भाप देती हूँ, उसकी नाक साफ़ करती हूँ, और उसे गर्म सूप पिलाती हूँ, और अक्सर दो-तीन दिन में वह ठीक हो जाता है। बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी इन छोटी-मोटी बीमारियों से लड़कर मज़बूत होती है। हालांकि, यहाँ एक बड़ी बात ध्यान रखने वाली है: बच्चों की इम्यूनिटी बड़ों से अलग होती है और कभी-कभी एक मामूली लगने वाली सर्दी भी जल्दी गंभीर रूप ले सकती है। खासकर छोटे बच्चों (एक साल से कम) में, या अगर बच्चे को पहले से कोई स्वास्थ्य संबंधी समस्या है, तो आपको ज़्यादा सतर्क रहना होगा। अगर सर्दी-खांसी 5-7 दिनों से ज़्यादा बनी रहे, या ऊपर बताए गए गंभीर लक्षण दिखें, तो यह अपने आप ठीक होने का इंतज़ार करने का समय नहीं है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि थोड़ी सी सतर्कता और सही जानकारी हमें बहुत सी परेशानियों से बचा सकती है। तो, गंभीरता से लें, पर घबराएं नहीं!






